• Q. ''रेगूलेटिंग ऐक्‍ट (1773), पिट्स इंडिया ऐक्‍ट (1784) तथा अन्‍तत: 1833 के चार्टर ऐक्‍ट ने ईस्‍ट इंडिया कम्‍पनी को भारत में उसके पहले की राजनीतिक एवं आर्थिक शक्ति की एक छाया मात्र बना दिया था।''

    उत्तर- 31 दिसम्‍बर 1600 ई. को इंग्‍लैण्‍ड की महारानी एलिजाबेथ ने पूर्वी देशों से व्‍यापार के लिए ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी को एकाधिकार प्रदान किया था। कम्‍पनी की समस्‍त शक्तियाँ 24 सदस्‍यीय परिषद को सौंपी गयी थी। कम्‍पनी ने व्‍यापार के लिए भारतीय प्रान्‍तों पर आर्थिक नियन्‍त्रण स्‍थापित करने और इसके लिए राजनीति में हस्‍तक्षेप करने की नीति अपनायी। 1763 तक प्‍लासी और बक्‍सर के युद्ध में विजय तथा 1765 में बंगाल की दीवानी प्राप्‍त कर ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी सर्वोच्‍य सत्ता सम्‍पन्‍न संस्‍था में परिवर्तित हो गयी।

        कम्‍पनी को प्राप्‍त विशेषाधिकारों से असन्‍तुष्‍ट वे लोग थे जो मुक्‍त व्‍यापार और उद्योग पर आधरित पूँजीवाद का प्रतिनिधित्‍व करते थे। यह लोग चाहते थे कि ब्रिटिश राज और कम्‍पनी के मध्‍य पारस्‍परिक सम्‍बन्‍धों का पुनर्निधारण होना चाहिए। कम्‍पनी के कुशासन और भ्रष्‍टाचार ने तथा कम्‍पनी द्वारा अपनी वित्तीय स्थिति को ठीक करने के लिए सरकार से ऋण की माँग ने ब्रिटिश सरकार को यह मौका दिया कि वह कम्‍पनी के कार्यों पर नियन्‍त्रण स्‍थापित करे। नियन्‍त्रण करने के लिए सरकार ने 1773 से 1833 तक विभिन्‍न एक्‍ट और चार्टर पारित किये और अंतत: कम्‍पनी पर पूर्ण नियन्‍त्रण स्‍थापित कर लिया।

    1. ब्रिटिश सरकार का उद्देश्‍य कम्‍पनी के भारतीय प्रशासन की बुनियादी नीतियों पर नियन्‍त्रण स्‍थापित कर ऐसी व्‍यवस्‍था स्‍थापित करने का था जिसमें (i) ब्रि‍टेन के उच्‍च वर्गों के सामूहिक हितों की रक्षा हो तथा (ii) कम्‍पनी का व्‍यापार पर एकाधिकार बना रहे। इस दृष्टि से 1773 में रेग्‍यूलेटिंग एक्‍ट पारित किया गया।

    (i) इस एक्‍ट द्वारा कम्‍पनी के शासन को व्‍यवस्थित बनाने का प्रयास किया गया। बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल कहा जाने लगा।  

    (ii) इस एक्‍ट ने कोर्ट ऑफ प्रोपराइटर्स में व्‍याप्‍त गडबडियों को समाप्‍त किया।

    (iii) कोर्ट ऑफ डायरेक्‍टर्स की गतिविधियों को ब्रिटिश सरकार की निगरानी में लाया गया।

    (iv) इस एक्‍ट द्वारा कम्‍पनी के अस्‍पष्‍ट पक्षपातपूर्ण शासन के स्‍थान पर कुछ निश्चित तथा स्‍वीकृत रूपरेखा वाली शासन पद्धति को विकसित कर कम्‍पनी पर नियन्‍त्रण किया गया।

    2. रेग्‍यूलेटिंग एक्‍ट के दोषों को दूर करने के लिए सरकार ने 1784 में पिट्स इण्डिया एक्‍ट पारित किया।

    (i) इस कानून के बल पर ब्रिटिश सरकार ने कम्‍पनी के मालों तथा उसके भारतीय प्रशासन पर पूर्ण नियन्‍त्रण स्‍थापित किया।

    (ii) कम्‍पनी के व्‍यापारिक कार्यों को डायरेक्‍टरों के पास रहने दिया गया परन्‍तु उसके राजनीतिक कार्यों का उत्तरदायित्‍व बोर्ड ऑफ कन्‍ट्रोल को दिया गया।

    (iii) बंगाल के गवर्नर जनरल के कार्यालय को असीमित अधिकार दिये गये।

    (iv) कम्‍पनी के अधिकारियों की साम्राज्‍यवादी एवं शोषणवादी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाया।

    (v) इस एक्‍ट द्वारा ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी ब्रिटेन की राष्‍ट्रीय नीति के लक्ष्‍य को पूरा करने का साधन मात्र बन गयी।

    3. ब्रिटिश सरकार ने 1813 के चार्टर एक्‍ट के अनुसार-  

    (i) भारतीय व्‍यापार पर कम्‍पनी का एकाधिकार समाप्‍त कर दिया।

    (ii) सभी ब्रिटिश नागरिकों को भारत के साथ व्‍यापार करने की छूट दी गयी।

    (iii) यह स्‍पष्‍ट किया गया कि ब्रिटिश भारत पर ब्रिटेन के क्राउन की सम्‍प्रभुता बनी रहेगी। इस प्रकार पहली बार ब्रिटिश साम्राज्‍य की संवैधानिक स्थिति को स्‍पष्‍ट कर कम्‍पनी को उसकी सीमाओं से अवगत कराया गया।

    4. 1833 के चार्टर एक्‍ट ने कम्‍पनी को आगामी 20 वर्षों के लिए जीवन दान दिया परन्‍तु यह स्‍पष्‍ट कर दिया गया कि-

    (i) कम्‍पनी अपने अधिकारों को 'ब्रिटिश सम्राट, उसके उत्तराधिकारी और भारत सरकार की सेवा में धरोहर के रूप में रखेगी।'

    (ii) ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी का व्‍यापारिक दर्जा पूर्णत: समाप्‍त कर दिया गया।

    (iii) भारतीय प्रशासन का केन्‍द्रीयकरण किया गया।

    (iv) प्रशासन तथा वित्त की समस्‍त शक्तियाँ भारत के प्रथम गवर्नर जनरल में सपरिषद समाहित की गयीं जो पूर्णत: ब्रिटिश सरकार द्वारा नियुक्‍त था।

      निष्‍कर्षत: रेग्‍यूलेटिंग एक्‍ट से 1833 के चार्टर पारित होने तक विभिन्‍न  संसदीय कानूनों के माध्‍यम से ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी तथा उसके भारतीय प्रशासन को पूरी तरह ब्रिटिश सरकार के अधीन बना दिया गया। यह अनुभव किया गया कि 6000 मील दूर रहकर ब्रिटिश सरकार भारतीय शासन को ठीक से नहीं चला सकती है अत: ब्रिटिश सरकार के प्रतिनिधि के रूप में गवर्नर जनरल इन कौंसिल को सर्वोच्‍य अधिकार प्रदान किये गये। गवर्नर जनरल अपनी परिषद् के निर्णयों को ठुकराने का अधिकार रखता था अ‍त: गवर्नर जनरल अब भारत का वास्‍तविक और प्रभावी शासक बन गया था। वह ब्रिटिश सरकार के नियन्‍त्रण और निर्देशन में कार्य करने को विवश था। कम्‍पनी की शक्ति एक छाया मात्र थी। वास्‍तविक सम्‍प्रभुता ब्रिटिश सरकार के पास ही थी। 1853 में कम्‍पनी चार्टर के नवीनीकरण का प्रस्‍ताव के समय इस माँग ने जोर पकडा कि ईस्‍ट इण्डिया कम्‍पनी को समाप्‍त कर क्राउन को भारत का प्रशासन अपने हाथ में ले लेना चाहिए अत: कम्‍पनी के चार्टर का नवीनीकरण संसद की इच्‍छा तक जारी रखा गया। यह इस बात की ग्‍यारंटी थी कि कम्‍पनी का शासन अब समाप्ति की ओर है। अंतत: 1857 के विद्रोह के पश्‍चात् 1858 के अधिनियम ने कम्‍पनी के शासन का अन्‍त कर दिया।

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