• Q. ब्रिटिश ''ने पहला मराठा युद्ध उस दौर में लड़ा जब उनकी किस्‍मत सबसे निचले स्‍तर पर थी''। टिप्‍पणी

    उत्तर- बक्‍सर के युद्ध के पश्‍चात् अंग्रेज जब ब्रिटिश सत्ता के विस्‍तार के लिए अग्रामी नीति की ओर बढ़ रहे थे मराठे भी 1761 के पानीपत की हार से उबरकर मराठा शक्ति को सुदृढ़ बना रहे थे। एक ओर जहाँ अंग्रेजी कम्‍पनी के ढाँचे का स्‍वरूप उनके राजनीतिक विस्‍तार में बाधक था वहीं पेशवा माधवराव की मृत्‍यु (1772) के पश्‍चात् मराठा राजनीति में वर्चस्‍व प्राप्‍त करने के लिए पूना में सत्ता संघर्ष आरम्‍भ हो गया था। यह समय को तय करना था कि अपनी आन्‍तरिक परिस्थितियों की जकडन में रहते हुये भी अंग्रेजों और मराठों के बीच राजनीतिक सर्वोच्‍यता के युद्ध में कौन अव्‍वल रहेगा।

         यह टिप्‍पणी कि ''ब्रिटिशों ने पहला मराठा युद्ध उस दौर में लड़ा जब उनकी किस्‍मत सबसे निचले स्‍तर पर थी'' का विवेचन निम्‍नलिखित तथ्‍यों और तर्कों की कसौटी पर देखना आवश्‍यक है।

    1.     राघोबा की पेशवा बनने की महत्‍वाकांक्षा और पेशवा नारायणराव की हत्‍या के कारण मराठों में जो फूट पड़ी उसमें अंग्रेजों की बम्‍बई सरकार ने राघोबा का साथ दिया। उन्‍हें  आशा थी कि अंग्रेजों ने बंगाल और मद्रास में जिस प्रकार की सफलता प्राप्‍त की वैसी ही वे पूना में प्राप्‍त कर लेगे। इससे उनको धन लाभ होगा परन्‍तु  राघोबा का साथ देने के कारण उन्‍हें मराठों के साथ एक लम्‍बी लड़ाई में उलझना पड़ा।

    2. अंग्रेज मराठा, निजाम और मैसूर के त्रिकोणी संघर्ष से बचना चाहते थे परन्‍तु  अंग्रेजों ने अपने विस्‍तार के परिप्रेक्ष्‍य में मराठों के गृहकलह में राघोबा का साथ देकर मुसीबत मोल ली क्‍योंकि सभी मराठा सदार, पेशवा और उसके प्रधानमन्‍त्री नाना फड़नवीस एक पक्ष में थे तो राघोबा दूसरे पक्ष में था। अंग्रेजों ने कमजोर पक्ष पर दांव लगाया। अत: उनकी स्थिति ठीक नहीं रही।

    3.     अंग्रेजों की बम्‍बई सरकार ने राघोबा को संरक्षण दिया और मार्च 1775 में उससे सूरत की सन्धि की। राघोबा को पेशवा बनाने का आश्‍वासन दिया गया। बदले में अंग्रेजों को सालसीट, बेसीन, ठाने प्राप्‍त होना थे। सन्धि कार्यन्‍वयन के लिए अंग्रेजी सेना ने मराठों को 1775 में आरस के मैदान में हराया और उनसे सूरत की सन्धि की। यह सन्धि गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्‍स की पूर्व स्‍वीकृति से नहीं हुयी अत: उसने सूरत सन्धि की अमान्‍य घोषित किया। वारेन हेस्टिंग्‍स राघोबा की मदद नहीं करना चाहता था अत: उसने मार्च 1776 को मराठों से पृथक से सन्धि की। अंग्रेजों के मध्‍य इस फूट ने मराठों का पलड़ा भारी कर दिया। अंग्रेजों की फूट पर नाना फडनवीस की कूटनीति भारी पड़ी।

    4.     बम्‍बई सरकार और गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्‍स के बीच जो तालमेल बिगड़ा उसमें कम्‍पनी के संचालकों को हस्‍तक्षेप करना पड़ा। संचालकों ने पुरन्‍दर के स्‍थान पर सूरत सन्धि को मान्‍यता दी। वारेन हेस्टिंग्‍स ने संचालकों के निर्णय को स्‍वीकार किया परन्‍तु इसका मनोवैज्ञानिक कूप्रभाव अंग्रेजी सेना पर पड़ा।

    5.     बम्‍बई सरकार ने राघोबा के समर्थन में एक सेना पूना की ओर भेजी परन्‍तु  तालगांव नामक स्‍थान पर अंग्रेज पराजित हुयेा 1779 को बम्‍बई सरकार को बारगांव के असम्‍मानजनक समझौते पर हस्‍ताक्षर करना पड़े। उन्‍हें प्राप्‍त प्रदेश और राघोबा को पेशवा के सुपुर्द करना पड़ा।

    6.     बारगांव सन्धि से मिट्टी में मिल गयी प्रतिष्‍ठा को वापस प्राप्‍त करने के लिए अंग्रेजों ने पुन: एक सेना पूना भेजी। दक्षिण भारत के शासक हैदरअली और निजाम अपने बीच अंग्रेजों की उपस्थिति से चिढे हुये थे अत: उन्‍होंने इस घड़ी का फायदा उठाकर मराठों का साथ दिया।

    7.     इस समय अंग्रेजों की किस्‍मत अच्‍छी नहीं थी। 1776 में अमेरिकी जनता के विद्रोह के कारण अंग्रेज भारत के बाहर भी लगातार हार रहे थे। फ्रांसीसियों के लिए अपने पुराने शत्रु से बदला लेने का यह उपयुक्‍त अवसर था अत: अंग्रेजों को उनका भी मुकाबला करना था।

    8.     अंग्रेज-मराठों के युद्ध में निर्णायक जीत किसी के पक्ष में नहीं हुयी। इन परिस्थितियों में हेस्टिंग्‍स ने महादजी सिन्धिया से पहल कर युद्ध बंद करवाया। 1782 की सालबाई की सन्धि ने स्थिति को यथावत बनाये रखने का निर्णय लिया।

    9.     चार वर्ष तक लम्‍बे और अति व्‍ययशील युद्ध के बाद भी अंग्रेजों को केवल सालबाई का द्वीप हाथ लगा जो पुरन्‍दर की सन्धि के समय से ही उनके पास था।   

         निष्‍कर्ष यह है कि अंग्रेजों के पक्ष में परिस्थितियाँ नहीं थी और उनकी किस्‍मत भी अच्‍छी  नहीं थी। अंग्रेजों की स्थिति सर्वोपरि भी नहीं हो पायी। सच पूछा जाये तो अंग्रेज मराठों की तुलना में कमजोर सिद्ध हुये। यदि वारेन हेस्टिंग्‍स सन्धि की कोशिश नहीं करता तो अंग्रेज निर्णायक रूप से पराजित भी हो जाते। यह सन्धि अंग्रेजों के दुर्भाग्‍य से न तो सम्‍मानजनक थी और न ही ऐसी थी जिनमें अंग्रेजी हितों की रक्षा हो सके।      

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