• Q. प्लासी का युद्ध एक महान युद्ध नहीं एक महान विश्वासघात था, टिप्पणी कीजिये?

    उत्तर - बंगाल का नवाब अलीवर्दीखॉ (1740-1756) यूरोपीय व्यापारिक कम्पनियों की कुटिल नीति और उद्देश्यों से परिचित था। उसकी मृत्यु के पश्चात् सिराजुद्दौला बंगाल का नवाब बना। वह भी यह अच्छी तरह जानता था कि अंग्रेज छल-कपट की राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं और बंगाल पर अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए किसी भी हद तक नीचे जा सकते है। अंग्रेजों ने जब और जहॉ भी मौका मिला विश्वासघात की राजनीति के माध्यम से अपनी स्थिति को दृढ़ करने के प्रयास किये।

    (1)    अंग्रेजों ने अलीवदीखाँ द्वारा नियुक्त सिराजुद्दौला को बंगाल का नवाब इसलिए स्वीकार नहीं किया क्योंकि सिराजुद्दौला से वह वांछित लाभ नहीं उठा सकते थे।

    (2)    बंगाल का नवाब होने के नाते अपने राज्य में किसी यूरोपीय कम्पनी को किसी भी प्रकार की सुविधा देना या न देना सिराजुद्दौला का अधिकार था। अंग्रेज बिना आज्ञा लिये और बलपूर्वक कलकत्ता की किलेबन्दी करना चाहते थे और मुगल सम्राट से प्राप्त फरमान के द्वारा मिले बिना कर दिये व्यापार को सुविधाओं का दुरूपयोग करना चाहते थे।

    (3)    नवाब ने जब अंग्रेजों के कुटिल इरादों पर नियन्त्रण के लिए आवश्यक कार्यवाही की, अंग्रेजों ने सिराजुद्दौला को नवाब पद से हटाने के लिए कूटनीतिक तैयारियाँ की। नवाब के असन्तुष्ट दरबारियों को उकसाने और लालच देकर उन्हें षड़यन्त्र के लिए तैयार करने के लिए अंग्रेजों ने समस्त नैतिक मूल्यों का त्याग कर दिया। अंग्रेजों ने कलकत्ता पर अधिकार कर नवाब को अलीनगर की सन्धि करने को विवश किया।

    (4)    कलकत्ता का अंग्रेज गवर्नर लॉर्ड क्लाइव अच्छी तरह जानता था कि सिराजुद्दौला से खुले युद्ध में जीतना कठिन है। अतः उसने सिराजुद्दौला को नवाब पद से हटाकर किसी ऐसे व्यक्ति को नवाब बनाने का षड़यन्त्र रचा जो अंग्रेजों के लक्ष्य पूर्ति में सहायक हो सके। सिराजुद्दौला का सेनापति और दामाद मीरजाफर अपने स्वामी और राज्य से विश्वासघात के लिए तैयार हो गया। राज्य से विश्वासघात करने के लिए तैयार अन्य लोग थे- दुर्लभराय, जगत सेठ, महाराज कृष्णचन्द्र और रानी भवानी। षड़यन्त्र की योजना बन जाने के बाद उसके सफल होने पर विश्वासघात की कीमत अर्थात् लूटपाट का हिस्सा भी तय किया गया।

    (5)    षड़यन्त्रकारियों और अंग्रेजों के बीच मध्यस्थता करने वाले अमीचन्द ने जब अधिक कमीशन की माँग की क्लाइव ने अमीचन्द को धोखा देने के लिए एक जाली पत्र तैयार करवाया। षड़यन्त्र के अन्दर षड़यन्त्र और विश्वासघात-प्रतिविश्वासघात की प्रतिद्वंदिता इस बात को लेकर थी कि कौन किसे कितना धोखा दे सकता है।

    (6)    नवाब को इस विश्वासघात को कुछ जानकारी थी परन्तु वह घर के भेदियों पर कड़ी कार्यवाही करने से बचता रहा क्योंकि अपनों के बीच उसने स्वयं को असहाय पाया। उसने मीरजाफर से वफा के लिए मिन्नतें की परन्तु मीरजाफर ने एक बार पुनः नवाब को अंधेरे में रखा और अपने इरादों को गुप्त रखा। नवाब की असहाय स्थिति ने षड़यन्त्रकारियों के इरादों को और दृढ़ बनाया।

    (7)    प्लासी के मैदान में 23 जून 1757 को जब युद्ध आरम्भ हुआ, मीरजाफर और दुर्लभराय जैसे सेनापति युद्ध क्षेत्र में तटस्थ खड़े रहे। वास्तव में इस युद्ध में नवाब की अधिकांश सेना ने युद्ध ही नहीं किया। जो नवाब के प्रति स्वामिभक्त थे, उनके मनोबल में भी कमी आयी और वे युद्ध क्षेत्र से भाग खड़े हुये। स्वाभाविक रूप से इस भगदड़ में सिराजुद्दौला भी भागा परन्तु पटना में पकड लिया गया जहाँ उसका वध कर दिया गया।

                प्लासी का पूरा युद्ध विश्वासघात की लम्बी कहानी है जिसे सोच-समझकर घटित किया गया। युद्ध के मैदान में नवाब की सेना अंग्रेजों की तुलना में अधिक थी परन्तु इसके बावजूद भी यदि अंग्रेज जीते तो यह उनकी वीरता एवं रणकुशलता का परिणाम नहीं अपितु धोखाधड़ी और विश्वासघात के कारण सम्भव हुआ। अंग्रेजों ने बंगाल में स्थायी शासन की स्थापना के पहले युद्ध में ही यह प्रमाण दे दिया कि राजनीतिक षड़यन्त्र, कुचक्र, कूटनीति में वे भारतीयों से बहुत आगे हैं।

                1757 में ही विश्वासघात की पीठिका लिखने वाले क्लाइव ने अपने एक साथी इतिहासकार उर्म को लिखा था, ‘‘तुम्हारे इतिहास के लिए मेरे पास असीमित सामग्री है जिसमें लड़ाई, कपट, वाक्छाल, षड़यन्त्र, राजनीति आदि न मालूम क्या-क्या विद्यमान है।’’ उसकी यह गर्वोक्ति स्वयं को दिया गया बड़ा प्रमाण-पत्र है।

                इतिहासकारों ने इस युद्ध को एक हुल्लड या भगदड़ कहा है। इसे युद्ध की संज्ञा नहीं दी जा सकती क्योंकि वीरता पर षड़यन्त्र हावी था। विश्वासघात की पटकथ पहले ही लिखी जा चुकी थी और नवाब युद्ध आरम्भ होने के पूर्व ही पराजित हो चुका था। युद्ध तो एक औपचरिकता मात्र थी क्योंकि नियति ने परिणाम पहले ही तय कर दिया था।

                विश्वासघात की कहानी प्लासी के युद्ध के बाद भी जारी रही। मीरजाफर के बाद मीरकासिम और मीरकासिम के बाद पुनः मीरजाफर कठपुतली नवाब अंग्रेजों की स्वार्थ लिप्सा और धोखेबाजी के शिकार हुये।

     

     

    इसी समय से अंग्रेजों की फूट डालो और राज्य करोकी नीति का आरम्भ हुआ जो अगले 200 वर्ष तक सफल रही। इसका कारण यह था कि भारतीय राजनीति में मीरजाफरसदैव जिंदा रहा। अंग्रेजों ने प्लासी के युद्ध से ही समृद्ध क्षेत्रों को लूटना और जनता का आर्थिक शोषण की शुरूआत की। भारत से धन का निष्कासन भी इसी समय से आरम्भ हुआ।

                निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि प्लासी का युद्ध एक प्रहसन मात्र था, महान युद्ध नहीं महान विश्वासघात था। मीरजाफर तब से आज तक विश्वासघात का प्रतीक बनकर खड़ा है।

  • Share this on
  • Join our telegram channel